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अन्तराल

नदी का पुल पार करने के लिए सड़क ऊँची होनी शुरू हो गई थी। सड़क के दोनों ओर बीहड़ नज़र आने लगे थे। उसकी निगाहें उस टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी को ढूँढ़ रही थीं जो उन

Bauni hoti parchhai by Manisha

सामने शीशे पर नजर बजे उठ जाना और उठा लेना घर भर का जुआ कन्धों पर कोल्हू के बैल की चार बज गये थे । रोहिणी ने अखबार उठा लिया

दो मिनट और रुक जा

पैड़ खोलकर वह फट्टे नीचे रखने लगा। रस्स्यिों को इकट्ठा करके उसने अँगीठी पर रख दिया। ईंटों के छोटे-छोटे कंकर बिखरे पड़े थे।

मेरी इक्यावन कविताएँ अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी कविता

ऊँचे पहाड़ पर पेड़ नहीं लगते पौधे नहीं उगते न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ बर्फ जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत की तरह ठंडी होती है

The Little Prince Collection नन्हा राजकुमार (Hindi)

घास के बीच सुबह खिलते और शाम को मुरझा जाते थे। परंतु राजकुमार का प्रिय फूल ऐसे बीज से अंकुरित हुआ था जो न जाने कहां से उसकी धरती पर आ

शिवपुरी में दिया गया व्याख्यान

अंग्रेज 23 टेक्स लगते थे आपने 64 लगाए। करना तो ये चाहिए था की अँग्रेजो के सारे टेक्स ख़तम कर देने चाहिए थे

शिवपुरी में दिया गया व्याख्यान

अंग्रेज 23 टेक्स लगते थे आपने 64 लगाए। करना तो ये चाहिए था की अँग्रेजो के सारे टेक्स ख़तम कर देने चाहिए थे

विविध जुलाई 2015

सतत त्रास से सूरे की अकेली राहत बच्चे थे । जो डीह बाबा के चौरे पर खेलते थे । वे आंख बंद कर उसके संसार में उतरने की कोशिश करते । वहां जो

युग

उन दिनों कैसेट का प्रचलन खूब जोर-शोर से था। गीतों के व परम पूज्य गुरुदेव के प्रवचनों के कैसेट तैयार किये जा रहे थे। कैसेट के इनले

गीत कलश 2012

12/30/2012ट्रेन की सीट पर थे बिखर कर पड़े कल के अखबार की सुर्खियों में छिपा कोल्हू के पथ से जुड़ लर ही रहीं यात्रायें सारी अब बतियाने लगते

ओशो द्वारा संत दरियाव वाणी पर –(प्रवचन–09) अमी झरत

7/22/2016मनुष्य के जीवन में अगर कोई सर्वाधिक अविश्वसनीय बात है तो वह यह है कि मनुष्य अनुभव से कुछ सीखता ही नहीं। उन्हीं—उन्हीं भूलों को दोहराता है। भूले भी नई

Bauni hoti parchhai by Manisha

सामने शीशे पर नजर बजे उठ जाना और उठा लेना घर भर का जुआ कन्धों पर कोल्हू के बैल की चार बज गये थे । रोहिणी ने अखबार उठा लिया

माह की कविताएँ

हां कब तक भागते रहेंगे कोल्हू के बैल की तरह हमें भी चाहिए आराम ज़िन्दगी का दर-बदर-दर की ख़ामोशी की ठोकरों में क्यों जीये

क्योंकि मैं उसे जानता हूँ अज्ञेय हिन्दी कविता

क्योंकि मैं उसे जानता हूँ अज्ञेय 1 आज़ादी के बीस बरस चलो ठीक है कि आज़ादी के बीस बरस से तुम्हें कुछ नहीं मिला पर तुम्हारे बीस बरस से आज़ादी को (या तुम से

रणीराम गढ़वाली – पहली बार

जन्म- 6 जून सन 1957 को ग्राम मटेला पौड़ी गढ़वाल उत्तराखण्ड।सम्प्रति- दिल्ली एम ई एस गैरीजन इन्जीनिया प्रोजेक्ट ईस्ट में सेवारत।प्रकाशित कृतिया- कहानी

35+ Most Famous Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

हमारी इस वेबसाइट को पड़ने पर आप सभी का दिल से धन्यवाद HindiParichay में आपको दुनिया भर के प्रसिद्ध लोगों की जानकारी मिलेगी और यदि आपको किसी

ननद की ट्रैनिंग

6/1/2019पर राजीव को कहां सबर थी। एक हाथ से मेरे मम्मे कस-कस के मसल रहे थे और दूसरे से वह मेरी तंग शलवार का नाड़ा खोल रहे थे। पल भर में मेरी शलवार

क्योंकि मैं उसे जानता हूँ अज्ञेय हिन्दी कविता

क्योंकि मैं उसे जानता हूँ अज्ञेय 1 आज़ादी के बीस बरस चलो ठीक है कि आज़ादी के बीस बरस से तुम्हें कुछ नहीं मिला पर तुम्हारे बीस बरस से आज़ादी को (या तुम से

शब्द

एक वक्त आता है जब आप सिर्फ शब्दों के बाजीगर बन जाते हैं आप एक मायने में कायर और ढोंगी हो जाते हैं आप नि शब्द रहना चाहते हैं पर उसके लिए भी शब्द तलाशते हैं

नयी उड़ान + 2015

11/29/2015वो कोल्हू के बैल भी हैं। निकल पड़ते हैं अँधेरे में ही तलाशते अपनी मंज़िल बिन डरे बिन थके। दम लेते हैं मंज़िल पर जा कर भर लेते हैं आसमान

के बारे में समाचार कोल्हू के शीशे पर कोल्हू लगते थे

कोल्हू सुविधाओं और क्षमता विवरण

कोल्हू क्या खतरे हैं

बिक्री के लिए कोल्हू जापान

आंतरिक मरम्मत की अनुमति के लिए कोल्हू

दक्षिण में कोल्हू लागत मूल्य

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