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हंस कथा सम्मान 2016 सम्मानित — योगिता यादव की

8/26/2016योगिता यादव की 'राजधानी के भीतर बाहर' के केंद्र में भले ही दिल्ली है लेकिन व्यथा सारे समाज की है राजधानी के भीतर बाहर - योगिता यादव (हंस कथा सम्मान 2016

Munshi Premchand Ki Kahaniya

विधवा हो जाने के बाद बूटी का स्वभाव बहुत कटु हो गया था। जब बहुत जी जलता तो अपने मृत पति को कोसती-आप तो सिधार गए मेरे लिए यह जंजाल छोड़ गए । जब इतनी जल्दी

आदिवासी जगत August 2009

जो जन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के दृष्टिकोण को अपना कर सदियों-सदियों जीते चले आ रहे थे और सौ अभावों के बावजूद अपने होते रहने की दीर्घ यात्रा करते रहे

AAJ KE DAUR KI RAGNI 01/01/2017

कोल्हू मैं पीड़ पीड़ मारे लगान भी उनके बढ़ाये थे पत्थर पुजवा बहकाये कोई नी बतारया मनै मैं सभी तैं पूछता आऊं सूँ।

खगोलशास्त्री झा मेरठ झंझारपुरऔर मुम्बई नवंबर

ज्योतिष सम्बंधित कोई भी आपके मन में उठने वाली शंका या बात इस पेज

बात अपनी 2015

12/21/2015जल्द ही सास से लड़ाई का बहाना भी उपस्थित हो गया। जाड़े का मौसम था। गन्ने की कटाई चल रही थी कोल्हू अलग से चल रहा था। बहत सारे मज़दूर लगे

विक्षनरी हिन्दी

लकड़ी लोहै या पत्थर आदि की बनी हुई एक प्रकार की चौकी जो चौड़ी कम और लंबी अधिक होती है। इसपर बराबर कई आदमी एक साथ बैठ सकते हैं। कभी कभी

ओशो गंगा/ Osho Ganga सहज योग

3—मैं बिलकुल पत्थर हूं और फिर भी भटकाता है। कोल्हू के बैल की तरह चलाता है। बस घूमते जो हमने गाया था--मुखड़ा नी माया

कश्यप की कलम से KASHYAP KI KALAM SE 2015

मीडिया से जुड़े बन्धुओं सादर नमस्कार ! यदि आपको मेरी कोई भी लिखित सामग्री लेख अथवा जानकारी पसन्द आती है और आप उसे अपने समाचार पत्र पत्रिका टी वी

हिंदी साहित्य और अनिवार्य नोट्स कक्षा 12

सांकेतिकता– परदे पर वक्त की कीमत है। बिंब –फूली हुई आँख की एक बड़ी तस्वीर अर्थग्रहण-संबंधी प्रश्न "ज़िंदगी में जो कुछ भी है

ANAND SINGH UJJWAL April 2008

जीवन मैं फल पाने की लिए श्रम तो करना पड़ता है ईश्वर सिर्फ लकीरे देता रंग स्वंय ही भरना पड़ता है! जो बीच राह मैं बैठ गए वे बैठे ही रह जाते है जो लगातार चलते

विक्षनरी हिन्दी

लकड़ी लोहै या पत्थर आदि की बनी हुई एक प्रकार की चौकी जो चौड़ी कम और लंबी अधिक होती है। इसपर बराबर कई आदमी एक साथ बैठ सकते हैं। कभी कभी

मारवाड़ी लोकोक्तियाँ

जाट र जाट तेरै सिर पर खाट। मियां र मियां तेरै सिर पर कोल्हू। 'क तुक जँची कोनी। 'क तुक भलांई ना जंचो बोझ तो मरसी।

ANAND SINGH UJJWAL April 2008

जीवन मैं फल पाने की लिए श्रम तो करना पड़ता है ईश्वर सिर्फ लकीरे देता रंग स्वंय ही भरना पड़ता है! जो बीच राह मैं बैठ गए वे बैठे ही रह जाते है जो लगातार चलते

बात अपनी 2015

12/21/2015जल्द ही सास से लड़ाई का बहाना भी उपस्थित हो गया। जाड़े का मौसम था। गन्ने की कटाई चल रही थी कोल्हू अलग से चल रहा था। बहत सारे मज़दूर लगे

आदिवासी जगत August 2009

जो जन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के दृष्टिकोण को अपना कर सदियों-सदियों जीते चले आ रहे थे और सौ अभावों के बावजूद अपने होते रहने की दीर्घ यात्रा करते रहे

आखर कलश 3/1/11

नाम यश मालवीय जन्म 18 जुलाई 1962 कानपुर उत्तर प्रदेश कुछ प्रमुख कृतियाँ कहो सदाशिव उड़ान से पहले एक चिडिया अलगनी पर एक मन में राग-बोध के 2 भाग

कहानी

इन दिनों आप हर सोमवार को युवा कहानीकारों की कहानियों का आनंद ले रहे हैं। अब तक हम आपको शशिभूषण द्विवेदी की कहानी 'एक बूढ़े की मौत' और गौरव सोलंकी की कहानी

कहानी

दोस्तो किन्हीं तकनीकी कारणों से हम सोमवार की कहानी को ठीक समय पर नहीं प्रकाशित कर सके उस बात का हमें खेद है। युवा कहानीकारों की कहानियों के प्रकाशन की

विकिपीडिया हिन्दी शब्दसूची

अनुक्रम अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऎ ऍ ऐ ओ ऒ ऑ औ क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न ऩ प फ फ़ ब भ म य र ल ळ ऴ व श ष स ह ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ पन्ने का शीर्ष — इन्हें भी देखें

के बारे में समाचार कोल्हू पत्थर नी कोल्हू कीमत

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