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कोल्हू का बैल बने गोल गोल घूमें हम कब तक? आओ कहीं आज घूरते हैं तिरछा एक अगिनबान बन कर इस ग्रहपथ से दूर!'' उन्होंने चिट्ठी मरोड़ी

शब्द और अर्थ February 2012

हर शब्द का हमारा आपका अनुभव अलग है शब्द के अर्थ हमारे अनुभव के अनुसार हमें सुख-दुःख संताप पीड़ा आह्लाद आनंद शांति द्वेष घृणा प्रेम जैसे उदगार देते हैं

उपन्यास

प्रभु सेवक ताहिर अली के साथ चले तो पिता पर झल्लाए हुए थे-यह मुझे कोल्हू का बैल बनाना चाहते हैं। आठों पहर तम्बाकू ही के नशे में डूबा

वातायन जून 2014

कोई कहता कि उसने ले जाकर सुखना बो को कहीँ किसी गड़हे-पोखरे में धकेल दिया तब सुखना बो पोर-पोर से जागी जो कोल्हू के दो बैलों के

जगतेश्वर आनंद धाम एवं कल्पान्त हीलिंग सेंटर

तंत्र--सूत्र--(भाग--2) प्रवचन-27 ध्वनि—संबंधी तीन विधियां—(प्रवचन—सत्‍ताइसवां) सूत्र 39—ओम जैसी किसी ध्‍वनि का मंद—मंद उ

विक्षनरी हिन्दी

संज्ञा पुं० [सं० पराञ्ज] १ तेल निकालने का यंत्र। कोल्हू २ फेन। ३ छुरी का फल। ⋙ परांजन संज्ञा पुं० [सं० पराञ्जन] दे० 'परांज'। ⋙ पराँचा

वर्धा हिंदी शब्दकोश कोश

वर्धा हिंदी शब्दकोश कोश वर्धा हिंदी शब्दकोश ब हिंदी वर्णमाला का व्यंजन वर्ण। उच्चारण की दृष्टि से यह द्वि-ओष्ठ्य सघोष अल्पप्राण स्पर्श है।

मगही

1347 कंगरेस (= कांग्रेस) (नसध॰ 30 130 30) 1348 कंझिला (गो॰ 5 24 13) 1349 कंटर (जाड़ा के दिन में गुड़ के भेली सोंप-जीरा आउर न जानी कउन-कउन मसाल

फुहार

फुहार आॅफिस पहुँचकर मेरी टेबल में आधी घुसी कुर्सी को खींचकर मैं इतमीनान से बैठ गया। गत दस वर्षों से मैं इसी टेबल-कुर्सी को प्रयुक्त करता था। अब तो यह

ओशो द्वारा संत दरियाव वाणी पर –(प्रवचन–09) अमी झरत

7/22/2016फिर भक्त के आंसू तो परम अनुभूति है जो हृदय के पोर—पोर से रिसती है। उस में पीड़ा है बहुत क्योंकि परमात्मा को पाने की अभीप्सा जगी है

True Love stories never ends जान समझ नहीं पाया तुमसे अनजाने में हो गया या फिर तुमने जानबूझ कर किया मगर सैकड़ों तस्वीरो में से बस एक तस्वीर में नज़र आता हूँ में| दस मिनट के

कर/kar

पुं० [सं०√कृ (बिखेरना)+अप्] १ मनुष्य के शरीर का हाथ। मुहा०—कर गहना=(क) किसी के पालन-पोषण अथवा किसी को सहारा देने के लिए उसका हाथ पकड़ना। (ख) उक्त उद्देश्य

शब्द और अर्थ February 2012

हर शब्द का हमारा आपका अनुभव अलग है शब्द के अर्थ हमारे अनुभव के अनुसार हमें सुख-दुःख संताप पीड़ा आह्लाद आनंद शांति द्वेष घृणा प्रेम जैसे उदगार देते हैं

मेरी कहानी

ससुराल में पहली रात तो वह फुआ के पास सोयी लेकिन अगले ही दिन शाम की पूजा होने के बाद कक्कन छूटने की रात फुआ उसको दूसरी कोठरी में ले गयीं

कहानी

9/26/2007कोल्हू पर सास के गोर लगलखुन गे। उस दिन सूरज डूबने का नाम ही नहीं ले रहा था। वैसे भी जब जिस बात का इंतज़ार हो वह मुश्किल से ही होती

चिरंतन स्त्री

आज फिर शुरू हुआ जीवन आज मैंने एक छोटी सी सरल सी कविता पढ़ी आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा आज एक छोटी सी बच्ची किलक मेरे कंधे चढ़ी

गीत कलश 2012

12/30/2012कोल्हू के पथ से जुड़ लर ही रहीं यात्रायें सारी अब चाहत होती और दूसरे सन्देशे ले आयें कबूतर वह निराशा का प्रहर अब उंगलियों की पोर

उपन्यास

प्रभु सेवक ताहिर अली के साथ चले तो पिता पर झल्लाए हुए थे-यह मुझे कोल्हू का बैल बनाना चाहते हैं। आठों पहर तम्बाकू ही के नशे में डूबा

कहानी

9/26/2007कोल्हू पर सास के गोर लगलखुन गे। उस दिन सूरज डूबने का नाम ही नहीं ले रहा था। वैसे भी जब जिस बात का इंतज़ार हो वह मुश्किल से ही होती

indore lekhika sangh इन्दोर लेखिका संघ इंदोर

महिला रचनाकारों के लिए है |कृपया अपनी मौलिक रचनाएँ अथवा साहित्य की अच्छी रचनाएँ जो आप मित्रों से साझा करना चाहते हैं वे भी भेज सकते है |साहित्य की

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